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लॉकडाउन में ये उपन्यास पढना काढ़ा पिने से कम नही

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https://www.amazon.in/dp/1649512562   मोबाइल के टिप टाप से अच्छा इस किताब को पढ़े ये काढ़ा है आत्मा को बूस्ट करने के लिए क्योंकि  खाली और लंबा समय घर में  अब लोग इसकी वजह से  मानसिक बीमार भी होने लगे है   जो लोग किताब पढने के शौक़ीन है उनके लिए तो रामबाण है   https://www.amazon.in/dp/1649512562 यूँ समझिए तो बूस्टर है और ये जो लोग नहीं पढ़ते दिन भर मोबाइल में टिप टाप कर रात में सोते वक्त तकिए के पास अपना मोबाइल ऐसे रखते है जैसे की कोई खजाना हो सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले मोबाईल का डाटा खोलते है और फिर सफरनामा शुरू हो जाता है दिन भर का  अब इससे कोई अछूता नही क्या बड़े, क्या बूढ़े, क्या बच्चे आजकल सबको टिप टाप की लत लग गई है इस लत ने लॉक डाउन में और बढ़ा दिया बहुत कम लोग है जो अब उपन्यास के पन्नो को पलट इसकी महक महूस करते है या कागज में लिखे स्याह में खुद तलाशते है और सबसे दुःख की बात ये है की हम अपने आने वाले समाज के बच्चों को भी ये सिखा नही पा रहे की किताबों से प्यार करो मगर इस   लॉक डाउन किताब को पढ़ा जाना   चाहिए ये किताब बिहार के   ह...

इन बच्चों का जीवन क्या फिर से रिबूट हो पाएगा ......

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कोरोना के दस्तक देने से पहले क्या किसी ने सोचा था की जिन्दगी इस  तरह सबकी बदल  जाएगी कई महीनो से हम सभी धरती वासी इसी इंतजार में जी रहे थे की कोरोना अब जाएगी तब जाएगी मगर इतने महीने हो गए कोरोना काफी स्पीड से बढ़ता जा रहा है अब बहार  मास्क पहनने की मजबूरी और आदत दोनों हो गयी है और जब बाहर निकलते भी है तो  अजीब सा डर लगता था  मेरे ख्याल से सबको लगता होगा पूरा शारीर और पूरा मस्तिस्क डरा होता था कोरोना के लाकडाउन  के खत्सम होते ही सबने   आजादी जैसा महसूस  करने लगे   मगर ऐसा हुआ नहीं पहले जैसा आजादी महसूस अब होती नही न किसी के करीब जा कर बात करने में ,न किसी से गले मिलने में;न हाथ मिलाने में ,न करीब जा कर  बात करने में .न अपनों का लाश जलाने में ,हमने सोचा की कोरोना विदेशी समस्या है हम उससे ऐसे लरेंगे जैसे गुलामी के वक्त अंग्रेजों से लड़े थे ,हमने लड़ाई लड़ी और अँगरेज़ भाग गए उसी तरह से कोरोना भाग जाएगा मगर ऐसा हुआ नहीं सब कुछ बदल गया अंग्रेजो और कोरोना में फर्क है कोरोना हमारा कर्म है हमारे कर्मो का फल है मगर अब लोग इसी कोरोना में मजे स...

ये लेख पढ़ दिल आपका मोम न हुआ तो आप पत्थर हैं.

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बहुत मामूली बातों और मामूली ज़रूरतों को याद करके कई बार एहसास ही नहीं होता कि वो नेमत  है। कहीं मैंने ये quote पढ़ा था  I have water to drink, I have a running tap, clothes to wear, food to eat , bed to sleep I am Lucky and I am thankful. लॉकडाउन के इस मौसम में ये जो बातें उपर लिखी है कितनी छोटी और सरल लगती है मगर आप लोग सोंच रहे होंगे मैंने ये सब क्यों लिखा आज जब मैं खाना खा रही थी कई दिनों से मेरे फ़ोन पर  अनजान नम्बरों से कॉल आते है दीदी कई दिनों से राशन की समस्या है हम लोग बाहर फँसे है या वो औरतें जो घर का डोर बेल बजा रही और बोल रही दीदी कैसे भी कर के मुझे राशन दीजिये  या फिर वो लोग जो पैदल निकल दिए घर तक कैसे पहुँचूँ इसका जुगाड़ लगा दीजिये कितना इंतज़ार किया होगा ? उन लोगो ने जो अभी अपने घर वालों से दूर फंस गए लोकडौन में  और बड़ी मुश्किल से मेरा नंबर किसी तरह ढूंढ के मुझ तक अपनी बात रख रहे है कोई इंसान किस हाल से गुज़रता होगा जब वो अपने बच्चों को कहता है कि अब मैं तुम्हें खाना नहीं खिला सकता और अब माँगना है! और हम यूट्यूब से नई चीज़ें बनाना स...

अब दुनिया मे कब जीवन पटरी पर फिर से दौड़ेगी कोई नही जानता!

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हमारे देश के लगभग लोगों के  पास न अपना घर है न ज़मीन है न ही कोई सरकारी नौकरी। ये ऐसे लोग हैं जो दिन भर काम करतें हैं और उस काम के बदले जो मेहनताना उसे मिलता है उससे वो अपना जीवन चलातें है। ऐसे लोग अपना भोजन सामग्री भी प्रत्येक दिन खरीदतें हैं। इनके पास इतना पैसा नहीं होता कि ये महीने भर का राशन एकबार खरीदे! डेली कामना और डेली खाना इनके जीवन का फंडा कहिये या इनकी मजबूरी! इनके पास बैंक खाता होगा भी तो सायद खाली होंगे आज पूरी दुनियां ही कॅरोना वायरस जैसी महामारी के चपेट में आ चुकी है। हर देश की सरकारें अपनी जनता को स्वास्थ्य सेवा, धन सेवा आदि-इत्यादि सुविधाऐं मुहैया करवा रह है। भारत सरकार ने भी इस महामारी से निज़ात पाने के लिए 'लॉकडॉन' करने  का आह्वान किया है। जब लॉक डाउन खत्म होगा भारत की इकॉनमी क्या होगी सोच के डर लग रहा है क्योंकि  जिनके पास घर नहीं है, खाने को कुछ नहीं है, जो डेली कमाने और खाने वालें हैं उनका क्या होगा?  कहाँ जाएंगे ऐसे लोग? क्या होगा उनका? उम्मीद करती हूं सरकार की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाने वाले सरकारी बाबू लोग सरकार की योजना से लाभ उठाने में...

बच्चे सिर्फ माँ की जिम्मेदारी नही है बल्कि पिता का भी है!

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बच्चा कोई भी ग़लती करे घर हो या बाहर हमेशा यही कहा जाता है ‘लगता है इसकी माँ ने इसे कुछ नहीं सिखाया!’ या बच्चे से कोई गलती हो जाए तो पिता हमेशा माँ को दोषी ठहराएगा तुम्ही ने ध्यान नही दिया होगा बच्चे पे कोई ध्यान कहाँ रखा अगर कोई बड़ी उम्र का व्यक्ति तक कोई ग़लती करे तब भी यही कहा जाता है। आज कितने विज्ञापनों में  माँ ही बच्चे को डाइपर पहनाने से लेकर, अच्छी आदतें सिखाना, उसके कपड़े साफ़ कैसे धोने हैं और उसके दिमाग की शक्ति के लिए उसे हेल्थ ड्रिंक पिलाना सबकुछ माँ ही करती हुई नज़र आती है। मां को ही डॉक्टर, शेफ़, टीचर और हर काम मैनेज करने वाली सुपरवुमन बनाकर पेश किया जाता है। एक तरह से पूंजीवादी पितृसत्ता ने माँओं को एक ऐसी संस्था बना दिया है जो हर तरीक़े से बच्चे के विकास के लिए ज़िम्मेदार है। इस बात में कोई शक नहीं कि पितृसत्ता ने हमेशा से औरतों को अपने काबू में रखना चाहा है। एक लड़की के बड़े होते ही उसे उसके छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी थमाई जाती है। साथ ही घर के सभी कामकाज भी उनसे कराये जाते हैं और ये सारे भेदभाव सिर्फ़ जेंडर की तर्ज पर किए जाते है। हमेशा से लड़कियों के ...

सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले को क्यों जाने

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सावित्रीबाई ज्योतिराव फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका    को याद करना क्यों जरूरी  है जो देश को सभ्य बनाने वाली एक महान महिला को याद करने का दिन है। सावित्रीबाई फुले वो महिला हैं जिन्होंने ब्राह्मणों के द्वारा कीचड़ और गंदगी फेंके जाने के बावजूद ओबीसी और दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोला। सावित्रीबाई वो महिला हैं जो फूल और सब्जियां बेचकर, गद्दे, रजाई और कपड़े सिलकर अपना परिवार चलातीं थीं। सावित्रीबाई जब ओबीसी दलितों की बेटियों को पढ़ाने जाती थीं तब दो साड़ियाँ लेकर निकलती थीं। रास्ते मे ब्राह्मण उनपर कीचड़, गोबर आदि फेंकते थे। सावित्रीबाई स्कूल पहुंचकर साड़ी बदलकर बच्चों को पढ़ाती थीं और फिर लौटने के लिए गंदी साड़ी पहन लेती थीं। ये उनका संघर्ष था शूद्रातिशूद्रों के कल्याण के लिए। सावित्रीबाई फुले वो महिला हैं जिन्होंने ओबीसी और दलित गरीबों की सेवा करते हुए अपनी जान दे दी। जब ओबीसी और दलितों की बस्तियों में प्लेग की बीमारी फैली तब सावित्रीबाई फुले ने रात दिन एक करके बीमारों की देखभाल की। इसी बीमारी के संक्रमण से उनकी मृत्यु हुई। आप सावित्रीबाई, ज्योतिबा, बिरसा मुंडा, डॉ. अ...

“निजी स्वतन्त्रता आज सबों की जरूरत हैं"

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“निजी स्वतन्त्रता” जोसेफ़ स्तालिन ने कहा था मेरे लिए यह कल्पना करना कठिन है कि एक बेरोज़गार भूखा व्यक्ति किस तरह की “निजी स्वतन्त्रता” का आनन्द उठाता है। वास्तविक स्वतन्त्रता केवल वहीं हो सकती है जहाँ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे का शोषण और उत्पीड़न न हो; जहाँ बेरोज़गारी न हो, और जहाँ किसी व्यक्ति को अपना रोज़गार, अपना घर और रोटी छिन जाने के भय में जीना न पड़ता हो। केवल ऐसे ही समाज में निजी और किसी भी अन्य प्रकार की स्वतन्त्रता वास्तव में मौजूद हो सकती है, न कि सिर्फ़ काग़ज़ पर।