इन बच्चों का जीवन क्या फिर से रिबूट हो पाएगा ......

कोरोना के दस्तक देने से पहले क्या किसी ने सोचा था की जिन्दगी इस  तरह सबकी बदल  जाएगी कई महीनो से हम सभी धरती वासी इसी इंतजार में जी रहे थे की कोरोना अब जाएगी तब जाएगी मगर इतने महीने हो गए कोरोना काफी स्पीड से बढ़ता जा रहा है अब बहार  मास्क पहनने की मजबूरी और आदत दोनों हो गयी है और जब बाहर निकलते भी है तो  अजीब सा डर लगता था  मेरे ख्याल से सबको लगता होगा पूरा शारीर और पूरा मस्तिस्क डरा होता था कोरोना के लाकडाउन  के खत्सम होते ही सबने   आजादी जैसा महसूस  करने लगे   मगर ऐसा हुआ नहीं पहले जैसा आजादी महसूस अब होती नही न किसी के करीब जा कर बात करने में ,न किसी से गले मिलने में;न हाथ मिलाने में ,न करीब जा कर  बात करने में .न अपनों का लाश जलाने में ,हमने सोचा की कोरोना विदेशी समस्या है हम उससे ऐसे लरेंगे जैसे गुलामी के वक्त अंग्रेजों से लड़े थे ,हमने लड़ाई लड़ी और अँगरेज़ भाग गए उसी तरह से कोरोना भाग जाएगा मगर ऐसा हुआ नहीं सब कुछ बदल गया अंग्रेजो और कोरोना में फर्क है कोरोना हमारा कर्म है हमारे कर्मो का फल है मगर अब लोग इसी कोरोना में मजे से जीने लगे है बिना डरे 

हालाँकि मुझे अक्सर इन बच्चों की चिंता रहती है बहुत मुश्किल से इनको पढना लिखना सिखाया था अब फिर से ये बाल मजदूरी में फसेंगे फिर से रिबूट का बटन काश इनके जिन्दगी में होता इस कोरोना के चक्कर में ये फिर काफी पीछे चले गयें 



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