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Showing posts from August, 2018

हम कितने सभ्य हैं खुद के अंदर झांकने की जरूरत है!

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कहते हैं कि हमसब काफी विकसित हो गए हैं। 21वीं सदी में जी रहे हैं ।  हमसब आज भी आदिम युग में जी रहे हैं । जंगल का कानून चला रहे हैं। सोचिए कितना बदलें हैं हम...आज उसकी तो कल आपकी बारी भी हो सकती है ... आरा के बिहिया में जो घटना घटी है वो घटना जितनी शर्मशार करने वाला नहीं है उससे कही अधिक शर्मसार करने वाली है हमारी खामोसी है।। गौर करिए कितने पोस्ट आपको पढने को मिला  सिद्दू ने गला क्या लगा लिया सारे वीर एक साथ कूद पड़े लेकिन एक महिला को निर्वस्त्र कर पूरे शहर में घूमाया गया है कही किसी कोने से भी आवाज नहीं आयी है                                           दुख की बात ये है कि हमारे ही समाज के लोग तमाश बिन थे लोग चुप चाप इस कृत्य को देखते रहे कही से भी कोई मदद के लिए आगे नहीं आया, लेकिन बड़ा सवाल यह है ,चंद लंफगों के सामने पूरा समाज नतमस्तक क्यों हो जा रहा है समाज इतना कमजोर क्यों हो गया इसके कारणों को समझने कि जरुरत है क्यों कि कहां कहां पुलिस खड़ी रहेगी और किसी भी समाज प...

गरीब आजादी का जशन मनाए कैसे?

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 जो लोग   आजादी का जश्न मनाने के लिए बेताब हुए बैठे हैं, वे एक पल के लिए सोचे  कि इन  दशकों में हमने हिन्दुस्तान के बचपन  को क्या दिया है? हमें यह विचार भी करना चाहिए कि ‘आज के बच्चे कल के नागरिक’ जैसे भावुक नारों का ऐसा दर्दनाक हालात क्यों हुए ? गरीब तो दो वक्त की खाने की जुगाड़ में लगा होता है उसे आजादी का जशन या आजाद देश मे गुलामी का अहसास में जिन सिख लिया और आपने आने वाली पीढ़ी को भी इसी अहसासों में जीने को मजबूर कर रहे है  उनकी झोपड़ियां हर बारिश के मौसम में टपकती हैं, हर सर्दी में कंपकंपाती और हर गरमी में ताप का शिकार बनती हैं। इसके उलट उनके वोट से बने सुख भोगने के  लिए बैठे लोग ऐश-ओ-आराम से जी रहे हैं। इनमें से अधिकांश के ऊपर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मुकदमे चल रहे हैं। यहाँ लोग दो मुखौटे रखते हैं। सत्ता आने-जाने के साथ वे उन्हें बदलते रहते हैं। अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह गरीबो  का नसीब। ‘निर्भया’ के साथ र्दंरदगी पर बरपा हंगामे को याद कीजिए। लगता था, पूरा देश महिला सुरक्षा के हक में खड़ा हो गया है। नतीजतन, पहले से कड़े कानूनों को...

देश बदल रहा है मगर बदलाव मातृभूमि को सही दिशा में ले जाए तो अच्छा

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सम्पन्न होना एक बात है और सेवा करना अलग मातृभूमि को कुछ लौटाने का जज़्बा होना एक बात उहै ससे कुछ लेना अलग कुछ लोग ऐसे होते हैं जो तमाम संसाधनों और सुविधाओं को छोड़कर अपना सेवा भाव  लिए अपना जीवन लगा देते है कई  सालों बाद कोई अपनी जैसी विचारों वाली doctor से मिली डॉक्टर सोनिया लगा कि स्तनपान जैसे गम्भीर मुद्दों पे बात की जानी चाहिए बहुत सारी पहलू जो कि अक्सर लोगो को पता नही होता जिसके वजह से गरीब ही नही अमीर घराने की महिलाएं भी अपना दूध पिलाने से बचती है कि कही फिगर खराब न हो जाए। हमे पता चला कि जो बच्चे माँ का दूध नहीं पिता या कम पिता है उसमें जुर्म करने की भावना ज्यादा होती है और इसका भी अहसास हुआ की पितृसत्तात्मक समाज के लिए जागरुकता जरूरी है। नारी स्वातंत्र्य के साथ ये भी समझना होगा कि व्यक्ति के रूप में माना जाए ना कि वस्तु।  सामंतवाद और पूंजी वाद दोनों ही औरतखोर है। दोनों ही से लड़ना होगा। यूँ तो  शिषु का पहला आहार माँ का दूध है पर कितनी अजीब बात है आज के इस मतलबी दुनिया मे ऐसे गम्भीर विषय पर तो बाबू लोग बड़े होटलो में कार्यक्रम और भर पेट भोजन की व्यवस्था कर...