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शिक्षा पायदान में हम कहाँ हैं ?

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 इस विषय पर कुछ लिखना अभी उचित होगा या नही, पर मुझे लगता हैं कि, मन में जब भी कोई ऐसी बात या विचार आये, जिसका सरोकार देश हित या आने वाली पीढ़ी से जुड़ा हो, तो अपनी बातों को लिख डालना चाहिए। भले ही उसके परिणाम जो हो आजादी के पहले से ही हमारे देश में शिक्षा और शिक्षक की व्यवस्था रही है। ब्रिटिश शासकों ने भी अपनी ओर से पूरी तरह की चाक चौबन्द व्यवस्था कर रखी थी कि, इस देश के बच्चे उनकी शैक्षिक व्यवस्था से पढ़कर, एक और  उम्दा किस्म का मानसिक गुलाम तैयार हो सके दशकों तक, मानसिक गुलाम तैयार करने वाली फैक्ट्री का कारोबार मुनाफे में चलता रहा। विडम्बना यह हुई कि, आज़ादी के बाद हमारे आजाद भारत को  बनाने की जिम्मेदारी भी उन्ही लोगो पर आ गई जिन्होंने कभी न कभी मानसिक गुलामी वाली शैक्षिक पद्धति को स्वीकार किया था। यह प्राकृतिक है कि, जिस मानसिकता में आप वर्षो रहते है, उसी तरह की मानसिकता आ जाती है और उस सोच को आप दूसरों पर भी परोसना चाहते है। आजादी के बाद, आज का भारत के निर्माताओं ने अपनी पूरी दूरदर्शिता से एक ऐसे भारत की कल्पना साकार करने की कोशिश की, जिसके हर पहलू में स्वार्थ ...