गरीब आजादी का जशन मनाए कैसे?



 जो लोग   आजादी का जश्न मनाने के लिए बेताब हुए बैठे हैं, वे एक पल के लिए सोचे  कि इन  दशकों में हमने हिन्दुस्तान के बचपन  को क्या दिया है? हमें यह विचार भी करना चाहिए कि ‘आज के बच्चे कल के नागरिक’ जैसे भावुक नारों का ऐसा दर्दनाक हालात क्यों हुए ?
गरीब तो दो वक्त की खाने की जुगाड़ में लगा होता है उसे आजादी का जशन या आजाद देश मे गुलामी का अहसास में जिन सिख लिया और आपने आने वाली पीढ़ी को भी इसी अहसासों में जीने को मजबूर कर रहे है
 उनकी झोपड़ियां हर बारिश के मौसम में टपकती हैं, हर सर्दी में कंपकंपाती और हर गरमी में ताप का शिकार बनती हैं। इसके उलट उनके वोट से बने सुख भोगने के
 लिए बैठे लोग ऐश-ओ-आराम से जी रहे हैं। इनमें से अधिकांश के ऊपर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मुकदमे चल रहे हैं।
यहाँ लोग दो मुखौटे रखते हैं। सत्ता आने-जाने के साथ वे उन्हें बदलते रहते हैं। अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह गरीबो  का नसीब। ‘निर्भया’ के साथ र्दंरदगी पर बरपा हंगामे को याद कीजिए। लगता था, पूरा देश महिला सुरक्षा के हक में खड़ा हो गया है। नतीजतन, पहले से कड़े कानूनों को और सख्त बना दिया गया, पर अपराधी संविधान की पोथी पढ़  जुर्म को अंजाम नहीं देते। नतीजा सामने है। मुजफ्फरपुर और देवरिया की परतें उघड़ रही हैं और उनसे फूटती दुर्गंध से देश फुट रहा है। उस समय के विपक्षी आज सत्ता में हैं। कल के सत्तानशीं अब विपक्ष में हैं। लिहाजा नारों और आक्रोश पर उनका अधिकार है। वे इसका उपयोग कर रहे हैं, जिसकी वजह से समूचा देश आरोपों की आतिशबाजी में तप रहा है। हो सकता है, यह हंगामा कुछ अफसरों को नाप दे, पर चेहरे बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। वैसे ही, जैसे कानून बदलने या बनाने से बलात्कार नहीं रुकते, बदहाली नहीं थमती। और न गरीबो को इंसाफ मिलता वो हर रोज इंसाफ के दरवाजे पे इस झूठी उम्मीद में खरे रहते है कि शायद आज उन्हें इंसाफ मिलेगा
फिर चलिए हम लोग आज़ादी का जशन मनाते है

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