देश बदल रहा है मगर बदलाव मातृभूमि को सही दिशा में ले जाए तो अच्छा

सम्पन्न होना एक बात है और सेवा करना अलग मातृभूमि को कुछ लौटाने का जज़्बा होना एक बात उहै ससे कुछ लेना अलग कुछ लोग ऐसे होते हैं जो तमाम संसाधनों और सुविधाओं को छोड़कर अपना सेवा भाव  लिए अपना जीवन लगा देते है कई  सालों बाद कोई अपनी जैसी विचारों वाली doctor से मिली डॉक्टर सोनिया लगा कि स्तनपान जैसे गम्भीर मुद्दों पे बात की जानी चाहिए बहुत सारी पहलू जो कि अक्सर लोगो को पता नही होता जिसके वजह से गरीब ही नही अमीर घराने की महिलाएं भी अपना दूध पिलाने से बचती है कि कही फिगर खराब न हो जाए। हमे पता चला कि जो बच्चे माँ का दूध नहीं पिता या कम पिता है उसमें जुर्म करने की भावना ज्यादा होती है और इसका भी अहसास हुआ की पितृसत्तात्मक समाज के लिए जागरुकता जरूरी है। नारी स्वातंत्र्य के साथ ये भी समझना होगा कि व्यक्ति के रूप में माना जाए ना कि वस्तु।
 सामंतवाद और पूंजी वाद दोनों ही औरतखोर है। दोनों ही से लड़ना होगा। यूँ तो  शिषु का पहला आहार माँ का दूध है पर कितनी अजीब बात है आज के इस मतलबी दुनिया मे ऐसे गम्भीर विषय पर तो बाबू लोग बड़े होटलो में कार्यक्रम और भर पेट भोजन की व्यवस्था कर इसे सफल मानते है शायद लोग भूल गए है कि बड़े बड़े जगहों में सेमिनार करने से समाधान नही होगा बल्कि जरूरत है कि सुदूर इलाको में गावं महिलाओ के बीच इसपे चर्चा की जाए खैर आज 'विश्व स्तनपान सप्ताह' जो कि हर साल अगस्त माह के पहले सप्ताह 1 अगस्त से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। इसका उद्देश्य महिलाओं को स्तनपान एवं कार्य को दृढ़तापूर्वक एक साथ करने का समर्थन देना है।

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