"सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर, मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।



"सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर,
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।

मौसम में  धान की कटनी का समय हो चला है मगर  इसमे  बच्चों का  बचपन कब कट गया पता  ही नही चला।
   कहते हैं दाने दाने पर लिखा हैं खाने वाले का नाम,पर उन बाल मजदूरों का बचपन और देश का भविष्य दोनो सेठ की अय्याशी तले दबे गया

चंद पैसों के लिए वो दिन भर कड़ी धूप में लगन से अपना काम करते हैं।धान काट फिर बटोर कर खेत के मालिक को जमा करते है और मालिक बोरी में भर ले जाते है बस कुछ अनाज की बोरी इतनी मेहनत के बदले देते है उस चील चिलाती धूप में सूर्य देवता भी रहम नही करते  इस गर्मी में तकलीफों का अहसास सिर्फ वो गरीब जो खेतों में काम करते है और उनके बच्चे जो अब खेतों में हाथ बटाने लगे ये वो लोग क्या जाने जो सिशो के घरों में ac लगा कुर्सियों बैठ देश चलाते है देश बदलने की बात करते हैं उस गरीब को क्या फर्क पड़ता है रोज इस गर्मी में सुबह से रात भर गेहूँ को काटने में लगा है क्या उसे देश में किसकी सरकार आएगी इस बात से मतलब से ज्यादा सायद इस बात से मतलब है कि कल रोटी कौन बनाएगा क्योंकि उस गरीब के घर का हर व्यक्ति गेहूँ काटने में लगा है अब ये बहुत जरूरी हो गया हम सभी को सोचने की देश में सिर्फ बात करेंगे उन गरीबों की या मदद करेंगे




इस चील चिलाती धूप में खेतो में अब तो गेंहू की कटनी में बच्चे भी नजर आते है
और ये उन मजदूरों के बच्चे है जिन्हें शायद शिक्षा पाने में सहायता की जरूरत है

"खून
मजदूर का जलता है कई मकान बनाने में  उनका खुद का न हवेली होता  न महल होता है और न कोई घर होता है

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