विकास की इन तस्वीरों का यह अहसास अचानक ही धुंधला जाता है.


तरक्की की इबारत पेश करती आलीशान इमारतें और सड़कों पर फर्राटे भरती लकदक गाड़ियां. बेहतरीन स्कूली ड्रेस में सजे—संवरे बच्चे और उनके पीछे—पीछे स्कूल बैग उठाकर चलते उनके माता—पिता. सचमुच कितना लुभावना है यह शहरी माहौल. अपनी कथित सभ्रांत सभ्यता पर इतराते शहर को देख एकबारगी जेहन में उभरता है कि वाकई देश तरक्की की राह पर है. 



तरक्की की इस रफ्तार में आने वाले दिनों में अपने देश को चुनौती देने वाला कोई नहीं होगा. लेकिन, विकास की इन तस्वीरों से निगाह घूमते ही यह अहसास अचानक ही धुंधला जाता है. सड़क किनारे मैले—कुचैले कपड़ों में अधनंगी बच्ची मुस्कुराहट बरबस ही ध्यान खींच रही थी. शायद उसे भी यह अंदाजा नहीं कि यह मुस्कुराहट उसकी स्वाभाविक है या फिर तरक्की के क्रूर मजाक पर यह उसकी मौन प्रतिक्रिया है.



बहरहाल, मलिन चेहरे के बीच जुगनू सी जगमगाती उसकी आंखों में अच्छा खाने, पहनने और स्कूल जाने के टूटे सपनों का अक्स साफ उभर रहा था. एकाएक शहर की तमाम शानो—शौकत और रंगीनियों को इस बच्ची की तस्वीर ढांप लेती है. क्या यह वही देश है जिसकी खूबसूरती पर इतराने को मन बेताब था? क्या यह देश की तरक्की की इबारत पर बदनुमा दाग है? लोग जिन्हें हिकारत भरी निगाह से देखते हैं,​ अछूत की तरह झिड़कते हैं, आखिर उसका अक्स बरबस क्यों मन को अंदर ही अंदर कचोट रहा है?



सवालिया झंझावात के बीच वह भी झलक उभरती है कि कैसे ये जमात एक सिक्का उछलने पर खुश हो जाती है. इतनी खुश कि लाखों रुपये की कारों में घूमने वाले लोगों को हजारों की पगार मिलने के बाद भी नसीब नहीं होती. इस एक रुपये की ललक में इस जमात को देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी से कोई मतलब नहीं, उनके लिए बस रोटी के चंद टुकड़े नसीब हो जाएं, वो भी किसी नियामत से कम नहीं है. 



सवाल यह भी कि तरक्की के मलमल में टाट का पैबंद लगाने वाली यह जमात कब दूर होगी. यह खत्म होकर तरक्की की कतार में खड़ी हो भी सकेगी या नहीं. उनके अंधेरे जीवन में भी खुशहाली का उजाला कभी होगा या नहीं. दशकों से यह 'गंदी तस्वीर' यूं ही कायम है. यह कभी हटेगी भी या नहीं. इस तस्वीर के जिम्मेदारों को सोचना होगा. तरक्की का एक कतरा उनके हिस्से भी आ सके, इस पर विचार करना होगा.


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